आगंतुक


Notice: Trying to access array offset on value of type bool in /home/u883453746/domains/hindagi.com/public_html/wp-content/plugins/elementor-pro/modules/dynamic-tags/tags/post-featured-image.php on line 36
आगंतुक के लिए कोई पूरे पट नहीं खोलता
वह अधखुले पट से झाँकता
मुस्कुराता है।

आगंतुक एक शहर से दूसरे शहर
जान-पहचान का सुख तज कर आया है
इस शहर में भी,
अमलतास के पेड़, गलियाँ, छज्जे और शिवाले हैं
आगंतुक लेकिन इन्हें ढूँढ़ने यहाँ नहीं आया है।

क्या चाहिए?
अधखुले दरवाज़े के भीतर से कोई संकोच से पूछता है,
आगंतुक घबरा कर एक गिलास ठंडा पानी माँग लेता है।

पानी पीकर
आगंतुक लौट जाता है।

जबकि किसी ने नहीं कहा
भीतर आओ,
कब से प्रतीक्षा थी तुम्हारी,
और तुम आज आए हो,
अब मिले हो
बिछुड़ मत जाना।

मोनिका कुमार की अन्य रचनाएँ।

Agantuk‘ A poem by Monika Kumar

Related

दिल्ली

रेलगाड़ी पहुँच चुकी है गंतव्य पर। अप्रत्याशित ट्रैजेडी के साथ खत्म हो चुका है उपन्यास बहुत सारे अपरिचित चेहरे बहुत सारे शोरों में एक शोर एक बहुप्रतिक्षित कदमताल करता वह

अठहत्तर दिन

अठहत्तर दिन तुम्हारे दिल, दिमाग़ और जुबान से नहीं फूटते हिंसा के प्रतिरोध में स्वर क्रोध और शर्मिंदगी ने तुम्हारी हड्डियों को कहीं खोखला तो नहीं कर दिया? काफ़ी होते

गाँव : पुनरावृत्ति की पुनरावृत्ति

गाँव लौटना एक किस्म का बुखार है जो बदलते मौसम के साथ आदतन जीवन भर चढ़ता-उतारता रहता है हमारे पुरखे आए थे यहाँ बसने दक्खिन से जैसे हमें पलायन करने

Comments

What do you think?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

instagram: