Author: अजय यादव

अजय यादव

अजय यादव, जो ख़ुद को एक आकस्मिक रचनाकार के रूप में दावा करते हैं। यह न केवल एक प्रतिभाशाली शृङ्गार-रस के रचनाकार हैं, बल्कि शब्दों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्यार भरे शब्दों को बुनने में भी माहिर हैं। इनके प्राथमिक रुचि में सङ्गीत और यात्रा शामिल है। इनकी प्रथम शृङ्गार की रचनाओं से सुसज्जित पुस्तक “ग्यारह तिल” प्रकाशित हो चुकी हैं।

अछूत शरीर

संक्षिप्त जुड़ाव की अधिकता⁣ शरीर में अन्दर से⁣ ख़ालीपन ला देता है,⁣ ⁣ महसूस करने की क्षमता⁣ अंतरङ्गता भूल जाती है,⁣ हमेशा स्पर्श की खोज में ⁣ शरीर भ्रमित रहता

मौन

संसार में कुछ भी मौन नहीं होता⁣ आवाज़ हर जगह⁣ अपना स्थान बनाये हुए है,⁣ ⁣ फूलों से पंखुड़ियाँ, पेड़ो से पत्तें⁣ सूखकर चुपचाप गिर जाते हैं,⁣ जीवन से मृत्यु

विरह गीत

हे प्रिये!⁣ मैं उदासीनता के दुःख में हूँ⁣ मुझे विरह के अवसाद से⁣ बचा लो…⁣ ⁣ पंछियों के स्वर सङ्गीत नहीं लग रहे⁣ मौन तेरे काँटों से तेज दिल में

परिणय

तुम्हें तीन जोड़ों वाली चीज़े बहुत पसंद थी।⁣ जैसे तीन दोस्तों की यारी,⁣ जैसे तीन नदियों का संगम⁣ जो जल को पवित्र बना देती है।⁣ ⁣ पर शायद तुम भूल

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