Author: chandrakant-devtale

chandrakant-devtale

यह जाते दिसंबर की आवाज़ है

देवियो और सज्जनो, चिड़िया की फुदक जितनी शाम और कुहरे के धब्बों में उड़ती ओझल हो रही हंस पताकाएँ सड़कों पर रेंगती हुई रोशनी से कुचलती परछाइयाँ और एक वर्ष

अंतिम प्रेम

हर कुछ कभी न कभी सुंदर हो जाता है बसंत और हमारे बीच अब बेमाप फासला है तुम पतझड़ के उस पेड़ की तरह सुंदर हो जो बिना पछतावे के

माँ पर नहीं लिख सकता कविता

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है मैं जब

जो नहीं होते धरती पर

जो नहीं होते धरती पर अन्न उगाने पत्थर तोड़ने वाले अपने तुम मेरी क्या बिसात जो मैं बन जाता आदमी आखेट और खेतीबाड़ी करते पुरखों ने जो आग के भीतर

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