Author: dinkar

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कृष्ण की चेतावनी

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा सम्भालो, चट्टानों की छाती से दूध निकालो, है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो । चढ़ तुँग शैल शिखरों पर

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनता ? हाँ,

टेसू राजा अड़े खड़े

टेसू राजा अड़े खड़े माँग रहे हैं दही बड़े। बड़े कहाँ से लाऊँ मैं? पहले खेत खुदाऊँ मैं, उसमें उड़द उगाऊँ मैं, फसल काट घर लाऊँ मैं। छान फटक रखवाऊँ

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