Author: naresh-saxena

naresh-saxena

पीछे छूटी हुई चीज़ें

बिजलियों को अपनी चमक दिखाने की इतनी जल्दी मचती थी कि अपनी आवाज़ें पीछे छोड़ आती थीं आवाज़ें आती थीं पीछा करतीं अपनी ग़ायब हो चुकी बिजलियों को तलाशतीं टूटते

इस बारिश में

जिसके पास चली गई मेरी ज़मीन उसी के पास अब मेरी बारिश भी चली गई अब जो घिरती हैं काली घटाएँ उसी के लिए घिरती है कूकती हैं कोयलें उसी

गिरना

चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर

आधा चाँद माँगता है पूरी रात

पूरी रात के लिए मचलता है आधा समुद्र आधे चाँद को मिलती है पूरी रात आधी पृथ्वी की पूरी रात आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है पूरा सूर्य आधे

एक वृक्ष भी बचा रहे

अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ एक वृक्ष जाएगा अपनी गौरैयों-गिलहरियों से बिछुड़कर साथ जाएगा एक वृक्ष अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले   ‘कितनी लकड़ी लगेगी’ शमशान

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