Author: nirmala-putul

nirmala-putul

आदिवासी लड़कियों के बारे में

ऊपर से काली भीतर से अपने चमकते दाँतों की तरह शान्त धवल होती हैं वे वे जब हँसती हैं फेनिल दूध-सी निश्छल हँसी तब झर-झराकर झरते हैं पहाड़ की कोख

क्या तुम जानते हो

क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत घर-प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम ।

एक बार फिर

एक बार फिर हम इकट्ठे होंगे विशाल सभागार में किराए की भीड़ के बीच एक बार फिर ऊँची नाक वाली अधकटे ब्लाउज पहने महिलाएँ करेंगी हमारे जुलुस का नेतृत्व और

बाँस

बाँस कहाँ नहीं होता है जंगल हो या पहाड़ हर जगह दिखता है बाँस बाँस जो कभी छप्पर में लगता है तो कभी तम्बू का खूँटा बनता है कभी बाँसुरी

मर के भी अमर रहते हैं सच्चाई के लिए लड़ने वाले

तुम मरे नही हो, ललित मेहता मरा नहीं है तुम्हारा ज़मीर तुम्हारी ईमानदारी की पुकार जनता के बीच गूँजती रहेगी हमेशा सदियों तक । तुम्हारी क़ब्र की दरारों से आवाज़ें

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा !

बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे मत ब्याहना उस देश में जहाँ आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते हों जंगल

मैंने अपने आंगन में गुलाब लगाए

इस उम्मीद से कि उसमें फूल खिलेंगे लेकिन अफ़सोस कि उसमें काँटें ही निकले मैं सींचती रोज़ सुबह-शाम और देखती रही उसका तेज़ी से बढ़ना। वह तेज़ी से बढ़ा भी

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