Author: pradumn-chourey

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तुम्हारे दिल में अगर मैं चाहूँ

मैं अगर तुम्हारे दिल में दाखिल होना चाहूँ तो चाहूँगा कि होऊँ जैसे जाड़े की सुबह, चली आती है धूप मेरे कमरे के भीतर। जैसे आ चुकी भी है, और

प्रेम की आवश्यकता

ज़िंदगी में प्रेम ज़रूर करना तुम। और करते रहना, कोशिश उसे पाने की। क्योंकि जैसे सत्य सब “शिव” हो जाएँगे अंत में, छोटी-मोटी पगडंडियाँ खुलेंगी राजमर्ग पर और नदियाँ सारी

हमारे पास एक घर है

हमें ना जीत की चाहत, हमें ना हार का डर है। हमारे पास एक घर था, हमारे पास एक घर है।। यही मासूम रुख़ देखो, यही इबलीस, दरिंदा है। कभी

दोस्ती के दायरे

छोटे, बड़े, बहुत बड़े शहरों की बहस के बीच मुझे हमेशा यही लगता है कि मेरा शहर मेरे साथ बड़ा होता रहा है। ज्यों-ज्यों मेरी उम्र बढ़ी, उसका दायरा बढ़ता

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