इतना होना बचा रहा

जो तुम्हारा नहीं
तुम्हें मिल गया भी तो क्या
ढोते हुए कहाँ से
कहाँ जाओगे
चिड़िया चली जाती है
पेड़ पंख नहीं उगाता
जड़त्व बाँधकर
वहीं खड़ा रहता है
फ़सलें चली जाती हैं
किसान वहीं रहता है
पेट पर कपड़ा बाँधे
तना रहता है
पथिक चले जाते हैं
पत्थर वहीं रहता है
दीर्घवृत्तीय परिसीमाओं से
मिट्टी पकड़े धँसा रहता है
लोग चले जाते हैं
मकान वहीं रहता है
नींवों की क़ब्ज़ में
अपना खंडहरपन बुनता रहता है
तुम जो सोचते हो
तुमने मेरा कुछ छीन लिया है
तो इस सम्भ्रम में मत भटको
तुम ना मेरा जड़त्व ले जा सके
ना मेरा धैर्य तोड़ सके
ना मेरा आधार हिला सके
ना मेरा एकाकीपन बांट सके
तुम ले गए
जो मेरे त्याग का परिमाण था
मेरे संकोच की आपदा थी
मेरे अप्रायोगिक सौन्दर्य का एक अंश था
मेरे पंजर शरीर की अपेक्षाएँ थीं
तुम जो यह पाकर भी
प्रश्नों से भरे पड़े हो
यह तुम्हारी कलुषित आत्मा की
क्षुब्धता का एक परिलक्षित रूप है
इस असंग स्थिति में भी
मैंने मेरा मैं होना बचा लिया
तुम तुम्हारा तुम होना दिखाते गए।

आदर्श भूषण की अन्य रचनाएँ।

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