मकड़ी

अक्सर सुलगने लगती हैं
मेरी उंगलियाँ सिगरेट की तरह
कुछ स्पर्श धुआं बनकर
मेरी आंखों के नीचे बैठ जाते हैं
फिर इस काई पर रातें
फिसलती रहती हैं
फिसलती रहती हैं

दूर किसी जंगल में लगी आग
मेरी गली में लैंप पोस्ट बन जाती है
दिन में तितली बनकर घूमती रही,
एक लड़की
रात को झींगुर बन जाती है
मंदिर के बाहर बैठता भिखारी
पेड़ बनकर खड़ा हो गया एक दिन
कुत्ते उसी के नीचे बैठकर
मोहल्ले की रखवाली करते हैं
दुनिया में कई कहानियाँ
एक ही कलम से लिखी गई हैं शायद

मृत्यु का सम्मोहन
नींद की लोरी से डरता है
मृत्यु महा प्रसाद है
नींद उस में रोज़ पड़ने वाला नमक
जीवन एक भूख है
जो घटती बढ़ती है रहती है
चांद के आकार के साथ

धर्म को अवैज्ञानिक कहने की मेरी ज़िद
एक जंग लगे कील की तरह
चुभती है मुझे ही
धर्म और विज्ञान
दोनो प्राचीन संबंधी हैं शायद
आस्था दोनों की मां
अन्वेषण दोनों के पिता
हर दीवार पर लटकती है एक फैमिली फोटो
किसी कील के सहारे

एक दोस्त की याद आने पर
मैं चीनी फांक कर सो जाता हूँ
मेरी स्मृति में शहद का स्वाद नहीं है
मगर ये बोध है कि कोई स्वाद भूल गया हूँ
किसी को भूल जाना
एक अलग किस्म की याद है

ट्रेन में खिलौने बेचने वाला बच्चा
एक दिन मेरे कमरे की सब किताब
फाड़कर भाग गया
इंजन की सीटी मुझे खत लिखती है
कहती है, उसे पिघलाकर
बनाया गया है लोकतंत्र जैसा कुछ
दुनिया में संगीत के नाम पर
क्यों बस ढ़ोल बचा है
जिसे बजाने के लिए
उसके पेट पर मारता है मुक्का
एक गरीब आदमी
उससे निकलने वाली ध्वनि
सबको सुनाई देती है बस उसे छोड़कर

जीवन का तर्क हो ना हो
जीना तर्कसंगत होना चाहिए
ये मकड़ियों के कुल में
एक प्रचलित मुहावरा है
कितना भी नया घर हो
एक कोना ढूंढ़ ही लेते हैं वो
जाल बुनने के लिए

प्रेम घर में एक चटाई बनकर लेटा है
जिस पर सो कर उगाए गए स्वप्न
बाज़ार में अच्छी कीमत पाते हैं
उससे सिलवाता हूँ
मैं एक नई कमीज़ हर बार

निरंजन कुमार की अन्य रचनाएँ।

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