कविता

अभिशप्त

जो चीज़ें मुस्कुराहटों के लिये जानी जाती रही हैं वे मुझे सदा से अभिशप्त लगीं। रंगबिरंगे पंख वाली तितलियों को फूलों पर इठलाते देखती तो रो देती सोच कर कि

विरह गीत

हे प्रिये!⁣ मैं उदासीनता के दुःख में हूँ⁣ मुझे विरह के अवसाद से⁣ बचा लो…⁣ ⁣ पंछियों के स्वर सङ्गीत नहीं लग रहे⁣ मौन तेरे काँटों से तेज दिल में

परिणय

तुम्हें तीन जोड़ों वाली चीज़े बहुत पसंद थी।⁣ जैसे तीन दोस्तों की यारी,⁣ जैसे तीन नदियों का संगम⁣ जो जल को पवित्र बना देती है।⁣ ⁣ पर शायद तुम भूल

शरद

जिस घड़ी तुम ने मेरे मन की चौखट पर कदम रखे मैं किसी दिवास्वप्न में मग्न थी तुम बहुत शीघ्र चले गए नहीं निहार सकी मैं तुम्हें आँख भर मुझे

बुख़ार में कविता

मेरे जीवन में एक ऐसा वक़्त आ गया है जब खोने को कुछ भी नहीं है मेरे पास— दिन, दोस्ती, रवैया, राजनीति, गपशप, घास और स्त्री हालाँकि वह बैठी हुई

असभ्य आदिम गीत

देह की सुडौल भाषा और रूप की जादुई लिपि के इलाके में आज भी पुश्तैनी बाशिन्दे की तरह दर्ज़ है उसकी उपस्थिति शामिल है वह उसके चंचल बचपन और अल्हड़

सबसे सुन्दर स्त्री हो जाती हूँ

टाँगी, हँसिया, दाब, दराँती ये सब हमारी सुन्दरता के प्रसाधन हैं जिन्हें हाथ में पकड़ते ही मैं दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री हो जाती हूँ। तब कहीं दूर रैम्प पर

प्रेमपत्र

प्रेत आएगा किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा जुआरी प्रेमपत्र पर ही दाँव लगाएगा ऋषि आएँगे तो दान में

आपदा और प्रेम

इस भीषण आपदा में जब जीवन एक संयोग भर है मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ सोचता हूँ क्यों और कैसे कुछ कहानियाँ किताबों में नहीं मिलतीं कुछ फलसफे नहीं मिलते

गिरना

चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर

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