प्रेम

प्रेम

प्रेम युद्ध नहीं मानता प्रेम दुःख भी नहीं जानता प्रेम को भाषा कहने वाले लोग अभी सम्पूर्ण रूप से सचेत है प्रेम आधिकारिक रूप से हमारी आत्मा की संतुष्टि है

प्रेम

प्रेम लौटता है, जैसे लौटती है ठंड में शाम की धूप। प्रेम सुकून देता है, जैसे सुकून देती है माँ के हाथों की गीली पट्टी ज्वर से तपते सिर को।

प्रेम

जानते हो मेरी कविताओं में तुम्हारे प्रेम के मायने क्या है? शायद, मैं ये तुम्हें कभी न बता पाऊँ इसका उत्तर ठीक वैसा ही है, जैसे वसुधा और व्योम के

अभ्यस्त हूँ

तुम्हारे नहा लेने के बाद, तुम्हारे भीगे तौलिये से अपना बदन पोंछना, तुम्हारा स्पर्श पा लेने जैसा है, ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच ये मेरे रोज़ का एक हिस्सा

प्रेमपत्र

प्रेत आएगा किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा जुआरी प्रेमपत्र पर ही दाँव लगाएगा ऋषि आएँगे तो दान में

अंत तक बचाए रखना

फूल तोड़कर तुम्हारे बालों में खोंस देना प्रेम नहीं है। पौधे में फूल को, तुम्हारे बालों के लिए अंत तक बचाए रखना प्रेम है। तुमसे इश्क़ का इज़हार कर देना

प्रेम ढूंढ़ता रहा कोमल स्पर्श

सुखों से उपजा दुख। दुखों से मैं। और फिर देर तक काँपता रहा जीवन निष्प्रयोज्य… निर्रथक… निरंतर… लहरें लहरों से टकराती रहीं जिजीविषा आखेट कराती रही। प्रेम ढूंढ़ता रहा कोमल

तुम्हें प्रेम देता रहूँगा

तुम्हारी घृणा की अग्नि मुझे पूरी तरह नहीं जलाती किसी मोमबत्ती की तरह मैं जलता रहता हूँ तुम्हें प्रेम देता रहता हूँ अपना अवशेष समेटते हुए। मोमबत्ती का अवशेष उजाले

छवि

जहाँ सभी लिख रहे हैं, प्रेम पर अपने हिस्से के किस्से, मैंने पाया स्वयं को अक्षम प्रेम पर लिखने में, किसी के लिये, प्रेम हृदय की कली पे विराजमान तितली

मुझको इतने से काम पे रख लो

मुझको इतने से काम पे रख लो जब भी सीने पे झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उसको मुझको इतने से काम पे रख

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