शिफाली की कवितायेँ

गिनती बनकर लौटा हूँ – शिफाली

तुम्हारे शहर की खिड़की में क्यों नहीं था मेरे हिस्से का भी सूरज तुम्हारे शहर के आंगन में क्यों मेरा कोना नहीं था तुम्हारे दीवारों-दर सारे ये कोठियां ये बंगले

सबने अपना भरोसा बांधा है – शिफाली

हरी गांठ इस भरोसे कि अबकि जो कोख हरियाएगी तो घर फिर मायूसी नहीं आएगी उसकी उम्मीद पर ना सही कुल की आस पर दुनिया में आएगी उसकी औलाद मां

इससे फर्क नहीं पड़ता है – शिफाली

तुम लड़के थे इतना फर्क ही काफी था 90 के उत्तरार्ध में मध्यमवर्गीय परिवेश से आई हम लड़कियों के लिए दो लड़कियों का एक दोस्त वो भी खान ये तो

बस, ब्याह की उम्र हटा दो ना – शिफाली

रात के तीसरे पहर जब लड़कियां देख रही होती हैं पहले प्रेमी का चौथा ख्वाब औरतें अपने सपनों में घर दफ्तर का फेरा लगाते थकी हारी बेखुदी में चूल्हे पर

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