शिफाली

गिनती बनकर लौटा हूँ – शिफाली

तुम्हारे शहर की खिड़की में क्यों नहीं था मेरे हिस्से का भी सूरज तुम्हारे शहर के आंगन में क्यों मेरा कोना नहीं था तुम्हारे दीवारों-दर सारे ये कोठियां ये बंगले

मेरे हिस्से का बसंत – शिफाली

मेरे हिस्से का बसंत भेजती हूँ तुम्हे तुम जो अंजूरी भर भर मेरी तरफ कड़ी धूप फेंका करते हो मेरे हिस्से का इत्मीनान भेजती हूँ तुम्हे तुम जो जीतने हारने

सबने अपना भरोसा बांधा है – शिफाली

हरी गांठ इस भरोसे कि अबकि जो कोख हरियाएगी तो घर फिर मायूसी नहीं आएगी उसकी उम्मीद पर ना सही कुल की आस पर दुनिया में आएगी उसकी औलाद मां

बस, ब्याह की उम्र हटा दो ना – शिफाली

रात के तीसरे पहर जब लड़कियां देख रही होती हैं पहले प्रेमी का चौथा ख्वाब औरतें अपने सपनों में घर दफ्तर का फेरा लगाते थकी हारी बेखुदी में चूल्हे पर

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