hindi poem

दिसम्बर

मुझे याद हो तुम जाते हुए और इस तरह जाते हुए की मुड़ने की ज़हमत नही की गई। एक बार तो देखना बनता था ना मुझे पत्थर बनते हुए। मैं

मौन

संसार में कुछ भी मौन नहीं होता⁣ आवाज़ हर जगह⁣ अपना स्थान बनाये हुए है,⁣ ⁣ फूलों से पंखुड़ियाँ, पेड़ो से पत्तें⁣ सूखकर चुपचाप गिर जाते हैं,⁣ जीवन से मृत्यु

बर्फ़

हम एक पूरी पीढ़ी हैं जो जमी जा रही है, हमारे दिल और जुबान बर्फ़ हो चुके हैं आत्मा का एक पूरा हिस्सा ठंडा पड़ चुका है ठंड से जमती

चीनी

हलवाई की दुकान के बाहर गिरी रह गई थी चीनी जिसे उठाकर मैं रख आया था बरगद की जड़ों के पास चींटियों के लिए जिन्हें महामारी के इस वक़्त में

देह के कर्ज

पूस, अगहन, माघ का फर्क नही जानती काल और समय से परे यंत्रचलित मशीन सी काम करती हुई वो देह लगता है सिर्फ कर्ज चुका रही है एक बरस में

आपदा

प्यारी लड़की तुम्हारे पास अधिकतर दो ही विकल्प होंगे लड़ना या चुप रह जाना तुम कोई भी चुनाव करो भीतर कुछ मर जाएगा ‘Aapda’ A Hindi poem by Samridhi Manchanda

प्रेम ढूंढ़ता रहा कोमल स्पर्श

सुखों से उपजा दुख। दुखों से मैं। और फिर देर तक काँपता रहा जीवन निष्प्रयोज्य… निर्रथक… निरंतर… लहरें लहरों से टकराती रहीं जिजीविषा आखेट कराती रही। प्रेम ढूंढ़ता रहा कोमल

सारंडा के फूल

नींद में डूबी बेख़बर फूलों की ख़ुशबू उठती है तिलमिला कर, जब नथुने भरने लगते हैं मशीनों की गंध से और फटने लगते हैं कान विस्फोटों से। उठकर महसूस करती

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त अधूरे

प्रेम

मेरी आत्मा के माथे पर लंगर डाले पड़े हैं सदियों से तुम्हारे वो चुम्बन जो पूर्ण होने से पहले खींच डाले गए विरह के क्रूर जाल में फंसाकर; मेरा प्रेम

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