दूसरा आदमी


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दूसरा आदमी हमेशा दूसरा ही होता है
वो पहले आदमी की कभी बराबरी नहीं कर सकता

दूसरे आदमी की जिंदगी
खुद की नहीं दूसरों की होती है,
अपनी प्राथमिकताओं में भी
वो दूसरा ही होता है

लोग उसे उसके दूसरे नाम से पुकारते हैं
पुकारे जाने में भी दूसरा और बुलाए जाने में भी दूसरा
उसका कोई फर्स्ट नेम नहीं होता

दूसरा आदमी
कभी किसी की पहली स्मृति नहीं होता
ना हीं बन पाता है,किसी का पहला प्रेम
अपनी प्रेमिकाओं के लिए भी
वो सदा दूसरा ही बना रहता है

उसके हिस्से का प्रेम कोई दूसरा पाता है
पहली ही बारी में

दूसरे आदमी के हिस्से में
आग नहीं होती
होती है तो सिर्फ ‘राख’

पेड़ कट जाने के बाद बचा हुआ डंठल
दूसरा आदमी है

दूसरे आदमी के जीवन में
गलतियों का स्थान हमेशा पहला होता है

उसकी चिंताएं भी उसके हिस्से की नहीं होती
दूसरे आदमी का दुख भी
उसका सगा नहीं होता
उसकी चिंताओं में सब होते हैं उसके सिवा
उसकी यात्राएं भी उसकी नहीं होती
अपनी यात्राओं में भी
वो किसी पहले की खोज में
भटकता है दरबदर हर ‘दूसरे चौराहे’ पर

भाग्य वो क्रूर निर्देशक है
जो उसकी कहानी में
इंटरवल के बाद आया
मात्र इतना बताने की
यह कहानी उसकी नहीं पहले आदमी की है

वो ना तो नायक है ना ही खलनायक
पहले आदमी की कहानी का दूसरा पात्र है वो

अपनी वास्तविकता से अलग
कहीं भीतर के अंडर ग्राउंड में
छुपकर बैठा है दूसरा आदमी कि
पहला आदमी आएगा
उसका हाथ थाम कर उसे बाहर ले जाने

हम बनावटी दुनिया के बनावटी लोग
आधे,पौने, सवा होकर भी
कभी पहले नहीं बन पाए
बन पाए तो केवल

‘दूसरे’ एक दूसरे के लिए।

‘Doosra Aadmi’ A Hindi Poem by Abhay Bhadouriya

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