गिनती बनकर लौटा हूँ – शिफाली


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तुम्हारे शहर की खिड़की में
क्यों नहीं था मेरे हिस्से का भी सूरज
तुम्हारे शहर के आंगन में
क्यों मेरा कोना नहीं था
तुम्हारे दीवारों-दर सारे
ये कोठियां ये बंगले सब तुम्हारे
मेरी तो बस दिहाड़ी थी
ये सारी रंगीनियां…. खुशियां सब तुम्हारी थी
मैं गलत था क्या
जो ये मान लिया कि तुम्हारी जिंदगी की
वो जरुरी ढिबरी हूँ
जो खो जाए तो काम अटक जाते हैं
मैं गलत था क्या
जो नहीं देख पाया
तुम्हारे मेरे बीच के फासले
मैं तो एक आवाज़ की दूरी पर खड़ा था
जाने अब कौन
तुम्हारे कीमती सूट की
चमक लौटाएगा
जाने अब कौन
तुम्हारी दीवारों पर रंग चढाएगा
कौन उतारेगा बाबू की जुराबें
कौन मेमसाहब के लिए अदरक वाली चाय
बनाएगा
ये कैसी घड़ी है
कि घड़ी घूम गई है वक्त की
सपने लादे शहर आया था
घर कंधे पर उठाए लौट रहा हूँ
तुमने सोचा कभी
लौटकर जाऊंगा
गांव को क्या मुँह दिखाऊंगा
कैसे बताऊंगा
कि नाम लेकर गया था
गिनती बनकर लौटा हूँ
कैसे बताऊंगा
पता लेकर गया था
पोटली लेकर लौटा हूँ
कैसे बताऊंगा
कि जिसके लिए गांव छोड़ा था
वो शहर, मेरे साथ
चौखट तक भी नहीं आया।

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