रोशनी


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इस रोशनी में
थोड़ा-सा हिस्सा उसका भी है
जिसने चाक पर गीली मिट्टी रखकर
आकार दिया है इस दीपक को

इस रोशनी में
थोड़ा-सा हिस्सा उसका भी है
जिसने उगाया है कपास
तुम्हारी बाती के लिए
थोड़ा-सा हिस्सा उसका भी
जिसके पसीने से बना है तेल

इस रोशनी में
थोड़ा-सा हिस्सा
उस अंधेरे का भी है
जो दिये के नीचे
पसरा है चुपचाप।

मणि मोहन की अन्य कविताएँ।

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