प्रेम का डाकिया


Notice: Trying to access array offset on value of type bool in /home/u883453746/domains/hindagi.com/public_html/wp-content/plugins/elementor-pro/modules/dynamic-tags/tags/post-featured-image.php on line 36
कुछ लोग हमारे जीवन में हमें प्रेम करना सिखाने आते हैं
वो हमसे प्रेम नहीं करते हैं
वो प्रेम के डाकिये होते हैं
जो हम तक प्रेम को पहुंचाते हैं
और जब हम प्रेम करना सीख जाते हैं
वो लौट जाते हैं फिर किसी दूसरे को प्रेम का डाक देने
मैं वहीं सिखाया प्रेम तुमसे कर रही हूँ
हम सब अपनी जिंदगी में कभी न कभी प्रेम के डाकिये बनते हैं
मैं भी वहीं डाकिया हूँ
तुम्हारे प्रेम सीखने तक मैं तुम्हारी हूँ।

‘Prem Ka Dakiya’ by Banarasiya

 

Related

अठहत्तर दिन

अठहत्तर दिन तुम्हारे दिल, दिमाग़ और जुबान से नहीं फूटते हिंसा के प्रतिरोध में स्वर क्रोध और शर्मिंदगी ने तुम्हारी हड्डियों को कहीं खोखला तो नहीं कर दिया? काफ़ी होते

गाँव : पुनरावृत्ति की पुनरावृत्ति

गाँव लौटना एक किस्म का बुखार है जो बदलते मौसम के साथ आदतन जीवन भर चढ़ता-उतारता रहता है हमारे पुरखे आए थे यहाँ बसने दक्खिन से जैसे हमें पलायन करने

सूखे फूल

जो पुष्प अपनी डाली पर ही सूखते हैं, वो सिर्फ एक जीवन नहीं जीते, वो जीते हैं कई जीवन एक साथ, और उनसे अनुबद्ध होती हैं, स्मृतियाँ कई पुष्पों की,

Comments

What do you think?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

instagram: