स्वीकारो


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विरह के अंतिम क्षणों में कहे गए शब्द,
शरीर की प्रत्येक शाखाओं में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं,
कुछ को पत्तियों की भाँति टूट जाने का अवसर मिलता है,
कुछ को बाध्य कर दिया जाता है,
और जो इन सभी परिस्थितियों में,
अबाध्य रूप से हो खड़े,
आनंदित होते हैं,
और प्रत्येक विक्षोभ का आस्वादन करते हैं,
निःसन्देह, वही प्रेम में होते हैं;

इससे अलग,
विरह को दुःख का प्रतिरूप समझना,
वही चेतना और प्रतिपादित करना,
उसी में अनुबद्ध हो, मूल्यांकन करना,
श्रेष्ठता, समर्पयता आक्षेपना,
अधिकारिता का द्योतक तो है, परन्तु नेह नहीं;

समुद्र की लहरों में नेह परिभाषित है,
हवाएँ सिर्फ नेह में बहती हैं,
वृक्ष का नेह फलों में अंतर्निहित,
तो पुष्पों की सुगंधि में नेहता ही नेहता है;

इनके लिए विरह, नेह के समानार्थी है,
दुःख नहीं, सुख की पराकाष्ठा है,
देयता का परिचायक,
और सुखद आत्मवृष्टि है,
जो नेह को सींचता है, 
पल्लवित और पुष्पित करता है;

ऐ दुःखंतिको!
देखो कितने विपरीत हो तुम,
देखो नेह की अलंघ्यता,
देखो! क्या है तुममें इतना कुछ?

नहीं ना!
तो स्वीकारो,
स्वीकारो कि तुम्हें,
अब तक प्रेम करना नहीं आया।

‘Sweekaro’ A Hindi Poem by Vijay Bagchi

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